दौड़ शुरू हुई जब जीवन की
तब वह छोटी बच्ची थी,
चुनौती स्वीकार कर ली उसने
कर्त्तव्य निष्ठ वह सच्ची थी
मंज़िल दूर है, राहें मुश्किल
सबने उसको ज्ञान दिया
चोट से कभी न आहत होगी
मन में उसने ठान लिया
शतरंज सी हर चल होगी
समझ यह आ गया उसको
प्रतियोगी तो वार करेंगे
दुर्ग बनाना भा गया उसको
भागी दौड़ी पुर ज़ोर लगा
मंज़िल उसे अब दिख रही थी
बस चिड़िया की आँख देखती
भली भांति वह सीख रही थी
ओह ! मंज़िल नहीं पड़ाव था बस
यह सफलता जो अभी मिली
ख़ुशी मानना व्यर्थ है लड़की
तेरी मंज़िल वह दूर खड़ी
नए सिरे से, नयी उमंग से
मंज़िल पाने फिर चल निकली
सुगम राहें भी आयी सामने पर
रुकी नहीं, पकड़ी उसने राह अगली
दोस्त , मधुर पल कितने ही मिले
मृगतृष्णा जान छोड़ दिए
मन ना डगमग हो कभी
कितने बंधन तोड़ दिए
"कैसी अजीब दौड़ है इसमें
ख़ुशी तो हाथ ही नहीं आती है
जब लगता अब मिल जायेगी
मंज़िल आगे बढ़ जाती है "
"मंज़िल आखिर है क्या तेरी ?"
इस सवाल से कातर वह जागी थी
कोई और था ही नहीं दौड़ में
वह अकेली प्रतिभागी थी
ठिठक गए कदम अचानक
स्वयं को यूँ अकेला पाया
ज़िन्दगी है कोई दौड़ नहीं
अब तक क्यों समझ न आया
"क्यूँ दौड़ी मैं इतने वर्ष
क्या मेरा इरादा था ?"
"हरूंगी न कभी किसे से "
क्यूँ यह ख़ुद से वादा था ?
असमंजस में खड़ी है वह
कोई जीवन के मायने बता दे
दौड़ने में काट दिए इतने वर्ष
कोई धीरे चलना सीखा दे
दौड़ नहीं तो क्या है जीवन
अभी समझना बाकी है
कितने प्यारे अनगिनत पल
अभी परखना बाकी है। ....
1 comment:
Wonderful.
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